जिस्म की जरूरत-18

Discussion in 'Hindi Sex Stories - हिंदी सेक्स कहानियाँ' started by xxx story, Feb 12, 2018.

  1. xxx story

    xxx story Active Member

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    hindi porn stories जैसे ही मेरी चूत के अंदरूनी होंठों ने खुलते हुए उसके लण्ड के अंदर घुसने के लिये रास्ता बनाया, और फ़िर ईन्च दर ईन्च अंदर घुसने लगा, तो हम दोनों कराह उठे। जब हम दोनों एक दूसरे की जीभ के साथ चूमा चाटी कर रहे थे, तब विजय का मोटा लण्ड आराम से मेरी पनिया रही चूत में धीमे धीमे अंदर घुस रहा था।

    ***

    मेरे होंठों को चूसते हुए प्यार से धीमे धीमे, पूरे मजे लेते हुए, विजय अपना लण्ड अपनी माँ की चूत में घुसा रहा था। जैसे ही उसने अपने फ़नफ़नाते लण्ड का जोर का झटका मेरी चूत में मारा, उसकी आँखें बंद हो गयी। उसकी उम्र में दुनिया में सबसे ज्यादा एहमियत चूत की थी, और मेरी गीली चूत में अपना लण्ड अंदर और फ़िर और ज्यादा अंदर घुसाकर मुझे चोदने में जो मजा उसको आ रहा था, वो उसके लिये अकल्पनीय था। हाँलांकि पिछले हफ़्तों में विजय कई बार मेरी गाँड़ में अपना लण्ड घुसा चुका था, और मेरे मुँह में तो अनगिनत बार अपने लण्ड का पानी निकाल चुका था, लेकिन चूत का मजा अलग ही था।

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    मेरी चूत ने मेरे बेटे के लण्ड का स्वागत कम से कम अवरोध के साथ किया था, और जैसे ही उसने अपना लोहे जैसा कड़क लण्ड मेरी चूत में घुसाया था, मेरी गीली चूत ने उसको जकड़कर अपने अंदर समाहित कर लिया था। मेरी चूत किसी कुँवारी लड़की की तरह टाईट तो नहीं थी, लेकिन ज्यादा ढीली भी नहीं थी, गीली, भीगी हुई और उसके लण्ड को जकड़े हुए थी। मेरी चूत विजय के लण्ड को गर्माहट दे रही थी, और उसका स्वागत कर रही थी, और चूत की मखमली चिकनाहट उसके लण्ड का पूरा ख्याल रख रही थी, और उसके लण्ड की मोटाई के अनुसार अपने आप को ऐडजस्ट कर रही थी। विजय के लिये ये सब किसी सपने से कम नहीं था, वो अपने लण्ड से उस औरत की चूत को चोद रहा था, जिसको वो सबसे ज्यादा प्यार करता था। और वो औरत कोई और नहीं उसकी सगी माँ थी, जिसने उसे जीवन दिया था और अब उसको वो शारीरिक सुख देकर उसके जिस्म की पूरी कर रही थी, जो उसको कहीं और मिल पाना असम्भव था।

    जब उसने पुरा लण्ड मेरी चूत में घुसा दिया, तो मैं अपने होंठ चुसवाते हुए ही कराह उठी, क्योंकि मेरी चूत ने इतना बड़ा लण्ड कभी अंदर नहीं लिया था, विजय का लण्ड उसक पापा के लण्ड से कहीं ज्यादा बड़ा था। विजय अपना पूरा लण्ड मेरी मखमली मुलायम चूत में घुसाकर, अंदर बाहर करते हुए मुझे तबियत से चोद रहा था। हम दोनों मस्त होकर चुदाई का मजा ले रहे थे, तभी हाँफ़ते हुए विजय ने अपनी आँखेंकर देखा।जैसे ही हम दोनों की नजरें मिलीं, तब मुझे यकायक वास्तविकता का एहसास हुआ कि मेरे सगे बेटे का लण्ड मेरी चूत के अंदर गर्भाशय पर टक्कर मार रहा था। समाज की मर्यादा, वर्जना को लांघकर हम दोनों के शारीरिक सम्बंध, एक पल को सब कुछ मेरे दिमाग में कौंध गया।

    "विजय बेटा, आहह्ह्ह्. बेटा विजय!"

    यकायक मानो किसी वज्रपात की तरह मेरा स्खलन हो गया, स्खलित होते हुए मेरा पूरा बदन काँप गया, मेरी साँसें उखड़ने लगी, और मैं अपने बेटे की मजबूत बाँहों में ही मचलने लगी, मेरी चूत में घुसे उसके मोटे लण्ड से मुझे पूर्णता का एहसास हो रहा था, और झड़ते हुए मेरी चूत उसके लण्ड को निचोड़ रही थी। चरम पर पहुँच कर मैं मस्त होकर विजय को कस कर जकड़े हुए थी, उसके कन्धों को अपने नाखून से खरोंच रही थी, और अपनी टाँगों को उसकी कमर के गिर्द लपेट कर, कुछ कुछ आनंद से भरी आवाजें निकाल रही थी।

    जब मेरी चूत विजय के पूरी तरह खड़े लण्ड को ऐंठने लगी, तो विजय भी घुटी घुटी आवाजें निकालने लगा। मेरी चूत धड़कते हुए मानो उसके लण्ड की मालिश कर रही थी, और उसकी सनसनाहट उसके सारे बदन में हो रही थी। अपनी मम्मी की चूत में लण्ड घुसाकर विजय को इतना ज्यादा मजा आ रहा था कि यदि उसने कुछ देर पहले मेरे मुँह में पानी ना निकाला होता, तो वो कब का मेरी चूत में स्खलित हो चुका होता।

    झड़ने के बाद जब मैं थोड़ा होश में आई तो हम दोनों माँ बेटे वासना में डूबकर चूत में लण्ड घुसाकर लेटे हुए थे। विजय का चेहरे पर चमक थी, और उसकी आँखों में वासना, मैंने उसकी तरफ़ देखते हुए कहा, "म्म्म्ह्ह बेटा, तुम बहुत अच्छी चुदाई करते हो, मैं तो बहुत अच्छी वाली झड़ी हूँ।"

    "मैं भी बस होने ही वाला था," विजय अपनी मम्मी की भीगी गीली चूत में अपना लण्ड थोड़ा और अंदर घुसाते हुए बोला। "जैसा मैंने सोचा था, आप उससे भी बहुत ज्यादा अच्छी हो मम्मी." वो बुदबुदाते हुए बोला, और उसने मेरे मम्मों को मसल दिया, मेरी गर्म मुलायम चूत में अपना मूसल पेलते हुए बोला, "आपकी चूत तो बहुत मस्त है!"

    "ये अब तुम्हारी है बेटा, तुम्हारी मम्मी की चूत पर अब बस तुम्हारा अधिकार है बेटा," कसमसाती हुई किसी तरह जो आग मेरी चूत और संवेदनशील निप्पल में लगी हुई थी, उस पर काबू करते हुए मैं बोली।

    विजय ने अपना पूरा लण्ड मेरी चूत में घुसा रखा था और मेरे चूत के दाने को भरपूर घिस रहा था, और धीरे धीरे झटके लगा रहा था, मानो वो हमेशा मेरी मुलायम प्यासी चूत में अपना लण्ड घुसा कर रखना चाहता था। उसकी ये कामुक हरकतें मुझे भी बहुत आनंदित कर रही थी।

    मेरी आवाज भारी और घुटी हुई निकल रही थी, फ़िर भी मैं विजय से भीख माँगते हुए बोली, "चोद दे बेटा, चोद दे अपनी मम्मी की चूत को, मार ले अपनी माँ की चूत विजय बेटा।" मेरी बार सुनकर विजय के लण्ड में हरकत हुई, तो मुझे उत्साहवर्धन मिला, "निकाल दे सारी गर्मी मेरी प्यासी चूत की, चोद दे इसे, निकाल दे अपने लण्ड का पानी अपनी मम्मी की चूत में, आह्ह्ह्. कब से लण्ड की भूखी है तेरी मम्मी की चूत, हाँ बेटा ऐसे ही चोद दे!"

    विजय का दिमाग घूम रहा था, और उसके कानों में मेरी दर्खाव्सत गूँज रही थी, फ़िर उसने अपने लण्ड को मेरी चूत में अंदर बाहर करना शुरू कर दिया। मेरी पनिया रही चिकनी चूत जिसने उसके लण्ड को जकड़ रखा था, उसमें उसने अपने मूसल लण्ड के धीरे धीरे झटके मारने शुरू किये। लेकिन कुछ ही सैकण्ड में उसकी बलवती होती चुदास और मेरी कामुक बातों का उस पर असर होने लगा, और वो मेरी चूत में अपने लण्ड के जोर जोर से झटके मारने लगा। और फ़िर वो अपनी मम्मी को पागलों की तरह चोदने लगा।

    जब उसका लण्ड मेरी चूत में घुसता तो हर झटके के साथ हर बार उसकी स्पीड और गहराई तेज होती जा रही थी। विजय मस्ती में डूबकर आहें भर रहा था। मेरी मखमली चिकनी चूत के एहसास के साथ मेरी चूत जो उसके लण्ड को निचोड़ रही थी वो उसका हर झटके के साथ मजा दोगुना कर रही थी।

    हम दोनों माँ बेटे ताल से ताल मिलाते हुए, स्वतः ही झड़ने के करीब पहुँच चुके थे। मेरी घुटी दबी आनंद से भरी आवाजें, उसके हर झटके की थाप के साथ चुदाई का मधुर संगीत बना रही थी। मैं अपने बेटे का लण्ड अपनी चूत में घुसवाकर मस्त हो रही थी, और विजय अपनी मम्मी की मुलायम मखमली चूत जिसने उसके लण्ड को अपनी चिकनाहट में जकड़ रखा था में अपने लण्ड को घुसाकर, अपनी मम्मी को मसलते हुए ताबड़तोड़ चोदे जा रहा था।

    सारी दुनिया से बेखबर हम दोनों माँ बेटे आलिंगनबद्ध, दो जिस्मों को एक बनाकर, हर वर्जना को तोड़ते हुए चुदाई का अपार आनंद ले रहे थे। उस वक्त चूत और लण्ड का मिलन ही सर्वोपरी था। विजय के हर झटके के साथ ताल में ताल मिलाते हुए, मैं अपनी गाँड़ ऊपर उछाल रही थी, जिससे मेरी चूत का चिकना छेद उसके लण्ड को हर झटके को आराम से ऊपर होकर लपक लेता था, विजय मेरी गर्दन को तो कभी मेरी उभरे हुए निप्पल को चूस रहा था। विजय मेरे प्यार में वशीभूत, वासना में डूबकर अपनी खूबसूरत माँ को चोदे जा रहा था।

    चुदाई के चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर मैं एक अलग ही दुनिया में मानो जन्नत की सैर कर रही थी, तभी विजय बोला, "मेरा पानी निकलने ही वाला है, मम्मी," और फ़िर उसने अपने लण्ड अंधाधुंध मेरी रस टपका रही चूत में पेलना शुरू कर दिया। "ओह मम्मी मैं बस आपकी चूत में झड़ने ही वाला हूँ, ओह्ह्ह मम्मी."

    अपने बेटे के लोहे के समान सख्त लण्ड के अंतिम झटकों को झेलते हुए मैं कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थी। जैसे ही विजय के लण्ड ने अंतिम झटका मारा, मेरी चूत में से भी मानो ज्वालामुखी की तरह विस्फ़ोट हो गया। विजय अपने लण्ड को मेरी चूत में घुसाये गर्म गर्म वीर्य की धार पर धार से मेरी प्यासी चूत में बौछार कर रहा था। उसने इतना ज्यादा पानी छोड़ा कि मेरी चूत की सुरंग में मानो बाढ ही आ गई। वीर्य निकालते हुए विजय के मुँह से जो संतुष्टी भरी आवाज निकल रही थी, मेरी चीख उसका बराबर मुकाबला कर रही थी। मेरे गर्भाशय से टकराती उसके वीर्य के गर्म पानी की पिचकारी को मेहसूस करते हुए, मैं मन ही मन सोचने लगी कि विजय की जवानी में निकले इतने सारे वीर्य के पानी से कोई भी लड़की एक बार में ही गर्भवती हो जाये।

    जैसे ही मैं अपने चर्मोमत्कर्ष पर पहुँची तो मेरी चूत ने विजय के लण्ड को कसकर जकड़ लिया, और उसको निचोड़ने लगी, और उसके तने हुए लण्ड को चूत के रस से नहलाने लगी। मैं अपने बेटे विजय के लण्ड से निकले वीर्य के पानी को अपनी चूत में मेहसूस करते हुए इस वर्जित सुख का आनंद ले रही थी। मैं विजय के कन्धों को अपने नाखून से नोंचने लगी, और अपनी टाँगें उसकी कमर पर कसकर लपेट लीं, और अपने बेटे के नीचे लेट हुए मैं काँप रही थी, मैं और विजय दोनों कामोन्माद में डूब रहे थे।
     

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